चीन को बधाई देते वक्त क्या गलवान के शहीदों की एक बार भी याद ना आई कामरेड?

बीते साल लद्धाख की गलवान घाटी में चीनी सैनिकों के साथ झड़प में भारत के 20 जवान शहीद हो गए थे. इसके बाद दोनों देशों के बीच संबंधों में तनाव चरम पर पहुंच गया और सेनाएं आमने-सामने खड़ी हो गईं. लेकिन इस घटना के बाद भारत में कुछ कथित लेफ्ट लिबरल्स और विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने भारतीय सेना के उस दावे पर भी सवाल उठाए जिसमें कहा गया कि चीन के भी 40 से ज्यादा सैनिक मारे गए हैं. फिलहाल सीमा पर भारतीय सेना पूरी तरह से चौकन्नी है और किसी भी स्थिति का सामना करने के लिए उनको खुली छूट दे दी गई है.

इस बीच बीती 1 जुलाई को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चीन यानी सीपीसी ने स्थापना दिवस मनाया है. जिसमें चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने ऐलान किया चीन के खिलाफ देशों का सिर कुचल देंगे साथ ही यह भी कहा कि वो पीएलए यानी चीन की सेना को दुनिया की सबसे ताकतवर देश बनाएंगे.

इन गीदड़भभकियों के बीच भारत में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (एम) यानी सीपीआईएम के महासचिव लद्धाख के शहीदों को भूल अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता निभाते हुए चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के नेता और राष्ट्रपति शी जिनपिंग को चिट्ठी लिखकर बधाई दी है. उन्होंने कहा कि बीती सदी इस बात का गवाह है कि किस तरह से चीन ने अपनी नीतियों को आगे बढ़ाया और अक्सर अपनी गलतियों की पहचान कर उनको दुरुस्त किया है.

येचुरी ने अपनी चिट्ठी में लिखा है, ‘सीपीआईएम हमेशा इस बात को बल देकर कहता है कि मार्क्सवाद- लेलिनवाद एक रचानात्मक विज्ञान है. ये कट्टरता का विरोधी है. इसको एक सिद्धांत तक ही सीमित नहीं किया जा सकता है. यद्यपि एक रचानात्मक विज्ञान होते हुए भी ये क्रांतिकारी सिद्धांतों का पूरी तरह पालन करता है. येचुरी ने आगे लेनिन को उद्घृत करते हुए कहा, ‘ यथार्थपूर्ण हालातों का ठोस विश्वलेषण द्वंदात्मकता का जीवित मूलतत्व है.’

कोरोना से निपटने के लिए चीन की ओर से किए गए प्रयासों का भी सीताराम येचुरी ने तारीफ की है. इसके साथ ही उन्होंने निशाना साधते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय पूंजीवाद, साम्राज्यवादी, वैश्विक उदारीकरण वाले देश मंदी के दौर में कंगाली की ओर बढ़ रहे हैं. येचुरी के अलावा सीपीआई के महासचिव ने डी. राजा ने भी चीन की शान में कसीदे खड़े हैं.’

जिस विचारधारा का ये दोनों नेता पालन करते हैं उसी को मानने वाले भारत में ही कई लोगों ने कई बार भारतीय सेना के पराक्रम पर सवाल उठाए हैं. जिस समय सीताराम येचुरी साम्राज्यवाद जैसे शब्दों को अपनी चिट्ठी में लिख रहे थे क्या उस समय उनको चीन के साम्राज्यवादी नीतियों की याद नहीं आई है. सीताराम युचेरी ये क्यों भूल गए कि कैसे चीन कैसे अपनी सीमाओं के विस्तार के लिए भारत,वियतनाम जैसे देशों के खिलाफ सेना का इस्तेमाल कर रहा है. बधाई देने का साथ-साथ क्या एक भारतीय होने के नाते सीताराम येचुरी चीन के राष्ट्रपति से सीमा पर उसकी सेना की ओर से की जा रही कारगुजारियों पर सवाल नहीं उठा सकते थे.

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