पिछले बार भुट्टो का समर्थन क्यों किया था ऐहार के आरएसएस-बीजेपी के नेताओं ने?

पंचायत चुनाव में एक सवाल ऐहार के आरएसएस-बीजेपी नेताओं से एक सवाल बार-बार पूछा जा रहा है कि बीते पंचायत चुनाव में वे भुट्टो के समर्थन में क्यों खड़े थे. ये सवाल उन लोगों की ओर से पूछा जा रहा है जो इस बार प्रधानी के चुनाव में भुट्टो की पत्नी साजिदा के समर्थन में खड़े हैं. गौरतलब है कि बीते चुनाव में जहां ऐहार में जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में दीपक सोनी का जोर था तो उनको टक्कर देते हुए भुट्टो ने चुनाव जीत लिया था जिसका आरएसएस से जुड़े नेताओं ने खुलकर समर्थन किया था.

इस सवाल को जब संघ से ही जुड़े एक नेता से पूछा गया तो उन्होंने नाम न बताने की शर्त पर बताया कि समाज के सभी वर्गों में स्वीकार्यता बढ़ाने और इलाके में गांव के वोटरों की हैसियत बढ़ाने के लिए ये आश्चर्य करने वाला फैसला लिया गया था. उन्होंने बताया कि आज जो लोग ये सवाल पूछ रहे हैं उनमें राजनीतिक समझ बिलकुल नहीं है.

उनका कहना था ‘ऐहार ग्राम पंचायत में 7 हजार से ज्यादा वोटर हैं लेकिन सरेनी विधानसभा का चुनाव हो या फिर जिला पंचायत का लोग यहां से वोट पाने के बाद भी इस गांव को तवज्जों नहीं देते हैं. जबकि इस गांव की ताकत का अंदाजा उसी समय हो गया था आज से 15 साल पहले जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में रामानंद लोधी के पक्ष में एकतरफा वोट करके जीत दिला दी थी. लेकिन इस जीत का सारा श्रेय पास के गांव रणमऊ के लोगों को मिला था’.

उन्होंने आगे बताया कि उसी के बाद ये तय किया गया कि जिला पंचायत सदस्य के चुनाव में इस ऐहार की ओर से भी जिताऊ प्रत्याशी खड़ा किया जाएगा… हालांकि इन सालों में ऐहार के ही कई धुरंधरों ने भी जिला पंचायत सदस्य का पर्चा भरा था लेकिन उनको ऐहार के ब्राह्मणों का समर्थन तो मिला लेकिन अन्य वर्गों और आसपास के गांवों में उनकी पहुंच की कलई खुल गई. लेकिन भुट्टो के साथ सभी समीकरण बिलकुल सटीक बैठ गए और उनको हर वर्ग का समर्थन मिला. इस चुनाव के साथ ही ऐहार के ब्राह्मणों की भी अन्य वर्गों में पहुंच बढ़ी. खासकर युवाओं का मेलमिलाप बढ़ गया.

आरएसएस नेता का कहना है कि आज इसी का नतीजा है कि होली हो या दिवाली जिला पंचायत का चुनाव लड़ने वाले नेताओं को ऐहार गांव की ताकत का अंदाजा हो गया और वे अब दिवाली हो या होली दोनों त्योहारों में यहां के लोगों से संपर्क बनाए हुए हैं. यहां तक कि विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले नेता भी गांव के युवाओं के संपर्क में हैं. ये बात अलग है कि किसी को ये बातें समझ में नही आती हैं.

संघ नेता ने कहा कि ये आज की युवा पीढ़ी को पता नहीं होगा कि न्याय पंचायत होने के बाद भी 40 सालों तक गांव का मुख्य रास्ता जो ऐहार को लालगंज-रायबरेली से जोड़ता है उस पर बड़े-बड़े पत्थर पड़े होते थे…और इस सड़क पर आए दिन दुर्घटनाएं होती थीं. लेकिन जब राज्य में बीजेपी की सरकार आई और सरेनी विधानसभा चुनाव जीतकर बीजेपी के विधायक बने गिरीश नारायण पांडेय की ही कोशिशों से पहली बार ये सड़क बन पाई थी.

बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर में विचारों में खासा अंतर होने के बाद भी महबूबा मुफ्ती के साथ सरकार बनाई गई थी लेकिन उसका उद्देश्य अनुच्छेद 370 हटाने का रास्ता साफ करना था. इसके बाद गांव के वर्तमान हालात पर चिंता जताते हुए कहा कि जो लोग अपनी आय का जरिया ढूंढने के लिए पंचायत चुनाव में उतरे हैं वे सियासत की इन गहरी बारीकियों को नहीं समझ सकते.

उन्होंने ये भी कहा कि जिस तरह उनको (भुट्टो) पिछली बार संगठन की ओर से समर्थन दिया गया था क्या उनका फर्ज नहीं था इस बार वह अपनी पत्नी का नामांकन कराने से पहले एक बार चर्चा कर लेते. जबकि उनको पता है कि संगठन से जुड़े लोग राजेश यादव के समर्थन में हैं.

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के रायबरेली जिले के ऐहार गांव में सीटें आरक्षित होने के बाद से सामान्य वर्ग के कई प्रत्याशियों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशी खड़े कर दिए हैं. कई सवालों और आशंकाओं के बीच चुनाव तीन मुख्य चेहरों पर आकर टिक गया है. राजेश यादव जो कि सामान्य सीट होने के दौरान ही मैदान में आ चुके थे महिला सीट होने की वजह से उनकी भाभी मैदान में खड़ी हैं. जिला पंचायत के पूर्व सदस्य भुट्टो की पत्नी साजिदा और शिवबरन की पत्नी गुड़िया मैदान में हैं. चौथे प्रत्याशी के रूप में सुनीता पाल ने भी नामांकन किया है उनको पूर्व प्रत्याशी काजल त्रिवेदी का समर्थन मिल रहा है और सुनीता पाल के समर्थकों की ओर से भी मजबूत दावा किया जा रहा है.

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