यूपी पंचायत चुनाव : लंबा कुर्ता, मुंह में गुटखा, ऐंठकर चलने की अदा, ‘युवा नेताओं’ की पहचान

पूरा उत्तर प्रदेश इस समय पंचायत चुनाव में डूबा हुआ है. कोरोना के मरीजों की बढ़ती संख्या का असर किसी पर नहीं हो रहा है. स्थानीय नेता खासकर युवाओं की फौज लंबा कुर्ता, गले में गमछा डालकर इन चुनावों में उत्साह से हिस्सा ले रहे हैं. इनमें से कई खुद को मिर्जापुर वेबसीरीज के मुन्ना त्रिपाठी के करैक्टर से प्रभावित दिख रहे हैं.

हालांकि सामान्य तौर पर राजनीति में युवाओं की भागीदारी देश के भविष्य के लिए अच्छा माना जाता है.लेकिन पंचायत चुनावों में बढ़चढ़कर हिस्सा ले रहे इन युवाओं का भविष्य क्या है. ये सवाल गंभीर है. प्रधानी का चुनाव लड़ रही एक महिला ने बताया कि उनके पास गांव के ही एक युवा नेता ने उनसे कहा कि वो उनको प्रधानी का चुनाव तो जिता देगा लेकिन उसमें उसका कमीशन कितना होगा. ये अलग बात है कि उन कथित नेता के कहने पर शायद उनके परिवार के ही वोट न दें.

दरअसल पंचायत चुनाव बीते कई सालों से उन छुटभैय्ये नेताओं की कमाई का जरिया बन गया है जिनको विधानसभा और लोकसभा चुनावों में नेताओं की गाड़ियों के पीछे बैठने का मौका मिलता रहा है. वो अपने नेता की भ्रष्ट कमाई की चमक-दमक से प्रभावित होते हैं और उनके दिमाग में यह बात आसानी से बैठ गई है कि राजनीति में पैठ बढ़ाने से उनको पैसा भी मिलेगा और समाज में दबदबा भी रहेगा लोग उनसे डरेंगे भी.

इन कथित नेताओं की भाषा, चालढाल से अंदाजा लगाया जा सकता है कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है..इनमें से ज्यादातर खुद को इलाके ‘दादा’ समझने की गलतफहमी पाले रहते हैं और इस भूल में भी रहते हैं कि फेसबुक पर किसी प्रत्याशी के समर्थन में ‘खुला सपोर्ट’ लिख देने से गांव के सारे समीकरण बदल जाएंगे.

इनमें से कई प्रत्याशी भी हैं और अगर उनसे ये पूछ लिया जाए कि गांव का भला करने का दावा करने से पहले ये बताएं कि उनकी खुद की आय का जरिया क्या है जिससे वो समाज में एक सम्मानित जीवन सकें तो चुप्पी साध लेते हैं.

दरअसल पंचायत चुनाव में युवाओं की ऐसी हिस्सेदारी बेरोजगारी, अशिक्षा और समाज में खुद को साबित करने की कुंठा मात्र है बस… हां, अगर कोई अपना बिजनेस, नौकरी या अपनी आय का जरिया बनाकर पंचायत चुनाव में उतरता है तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. समाज में ऐसे उदाहरण भी हैं.

छवि रजावत गांव की महिलाओं के साथ

राजस्थान की छवि रजावत एमबीएम की डिग्री लेकर कारपोरेट सेक्टर में नौकरी कर रही थीं. उनके मन में गांव की सेवा करने का भाव था. एक दिन उन्होंने लाखों की सैलरी वाली नौकरी छोड़ दी और गांव में आकर प्रधानी का चुनाव लड़ा. उनके कामों से प्रभावित होकर सरकार ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र में भी भाषण देने का मौका दिया था.

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